SOCIETY PHOBIA
SOCIETY PHOBIA
समाज का डर
हम सभी जिस परिवेश से आते है वहां एक शब्द बहुत लोकप्रिय है समाज। समाज क्या कहेगा ?लोग क्या सोचेंगे ? शायद ये ध्वनि हम सभी के कानों में इतनी बार गुंजी है की अब तो इसकी आदत सी हो गई है। अच्छा बुरा गलत सही सब कुछ समाज ही तो सत्यापित करता है और करे भी क्यों न हमने इन्हे इस बात का सर्टिफिकेट जो दे रखा है। बचपन में नागरिकशास्त्र की पुस्तक में पढ़ा था की मनुष्य स्वभाव से ही एक सामाजिक प्राणी है। ये सही भी है न मानव रहित समाज की कल्पना की जा सकती है न समाज बिन मानव की। पर एक बात धयान देने वाली है की जब हम अपना समाज स्वयं बनाते है तो फिर इससे डरते क्यों है?जानते है क्यूं,क्यूंकि हमें हमेशा अपनी प्रतिष्ठा,मान,सम्मान इत्यादि का स्मरण रहता है। कुछ मामलो में ये डर सार्थक भी है क्यूंकि ये हमें कोई भी ऐसे वैसे कदम नहीं उठाने देता जिसे हमारे परिवार और समाज की शाख पर कोई असर पड़े। पर ये डर तभी तक सही है जब तक की ये हमारे ऊपर किसी प्रकार का कोई मनोवैज्ञानिक दबाव न उत्पन्न होने दे।
जैसा की आप सभी जानते है की हमें बहुत छोटी सी ज़िन्दगी मिली है , और जो करना है इसी ज़िन्दगी में करना है। अब फैसला आपके हाथ में है आपको समाज के साथ चलना है उनकी बातें सुननी है या अपनी अलग पहचान बनानी है। मै ये नहीं कहता की आप समाज से बगावत कर लो या समाज का बहिस्कार कर दो मेरी सलाह बस यही है की कहीं ऐसा न हो की समाज की ख़ुशी के लिए अपने अरमानो का गला घोट दे। देखिये बात बिलकुल साफ़ है अगर आप कुछ भी करे आपको सफलता मिलेगी तो पूरा समाज आपके साथ है पर अगर आप विफल हो जाये तो यही समाज आपको गुमनामी के अन्धकार में छोड़ देगा। तो फिर ये कैसे मान लिया जाये की समाज मनुष्य के साथ है। ये हमारा भ्रम है की समाज हमारे साथ है और ये हमारा डर है की समाज हमारे साथै नहीं है।
लोग मुझे जॉब सीकर कह के बुलाते है ये सच भी है की मैंने नौकरिया छोड़ी है पर क्या उस समाज के लिए छोड़ी है जो मेरे पीछे मेरी चर्चा करता है बिलकुल भी नहीं मैंने इसलिए छोड़ी की मुझे पसंद नहीं आई। पर क्या समाज पसंद न आए तो समाज छोड़ सकता हूँ बिलकुल नहीं फिर मुझे अपने हिसाब से अपने लायक समाज की तलाश करनी होगी। क्या आपने कभी किसी बैंकर को किसी डकैत के साथ चर्चा करते सुना है नहीं न आपने कभी किसी रईश को किसी की गरीबी और लाचारी में उसका हाथ थामते देखा है अगर देखा भी होगा तो ऐसा विरल ही होगा। जो जिस व्यवसाय में होता है उसका समाज उसी के अनुरूप हो जाता है।
अब अनाथ होने का दर्द वो क्या समझेंगे जो अपने माँ बाप के साथ रहते है ठीक उसी प्रकार संतान न होने की पीड़ा वही समझ सकते है जिनके बच्चे नहीं है। एक छात्र के मस्तिष्क मंडल पर लगने वाले असंतुलित बल को एक छात्र ही समझ सकता है और एक शिक्षक की अभिलाषा एक शिक्षक।
इसलिए दोस्त समाज से डरो नहीं समाज का सम्म्मान करो पर तभी तक जब तक ये समाज आपके आत्मसम्मान को नुक्सान न पहुचाये।
धन्यवाद
आशीष
A.K
समाज का डर
हम सभी जिस परिवेश से आते है वहां एक शब्द बहुत लोकप्रिय है समाज। समाज क्या कहेगा ?लोग क्या सोचेंगे ? शायद ये ध्वनि हम सभी के कानों में इतनी बार गुंजी है की अब तो इसकी आदत सी हो गई है। अच्छा बुरा गलत सही सब कुछ समाज ही तो सत्यापित करता है और करे भी क्यों न हमने इन्हे इस बात का सर्टिफिकेट जो दे रखा है। बचपन में नागरिकशास्त्र की पुस्तक में पढ़ा था की मनुष्य स्वभाव से ही एक सामाजिक प्राणी है। ये सही भी है न मानव रहित समाज की कल्पना की जा सकती है न समाज बिन मानव की। पर एक बात धयान देने वाली है की जब हम अपना समाज स्वयं बनाते है तो फिर इससे डरते क्यों है?जानते है क्यूं,क्यूंकि हमें हमेशा अपनी प्रतिष्ठा,मान,सम्मान इत्यादि का स्मरण रहता है। कुछ मामलो में ये डर सार्थक भी है क्यूंकि ये हमें कोई भी ऐसे वैसे कदम नहीं उठाने देता जिसे हमारे परिवार और समाज की शाख पर कोई असर पड़े। पर ये डर तभी तक सही है जब तक की ये हमारे ऊपर किसी प्रकार का कोई मनोवैज्ञानिक दबाव न उत्पन्न होने दे।
जैसा की आप सभी जानते है की हमें बहुत छोटी सी ज़िन्दगी मिली है , और जो करना है इसी ज़िन्दगी में करना है। अब फैसला आपके हाथ में है आपको समाज के साथ चलना है उनकी बातें सुननी है या अपनी अलग पहचान बनानी है। मै ये नहीं कहता की आप समाज से बगावत कर लो या समाज का बहिस्कार कर दो मेरी सलाह बस यही है की कहीं ऐसा न हो की समाज की ख़ुशी के लिए अपने अरमानो का गला घोट दे। देखिये बात बिलकुल साफ़ है अगर आप कुछ भी करे आपको सफलता मिलेगी तो पूरा समाज आपके साथ है पर अगर आप विफल हो जाये तो यही समाज आपको गुमनामी के अन्धकार में छोड़ देगा। तो फिर ये कैसे मान लिया जाये की समाज मनुष्य के साथ है। ये हमारा भ्रम है की समाज हमारे साथ है और ये हमारा डर है की समाज हमारे साथै नहीं है।
लोग मुझे जॉब सीकर कह के बुलाते है ये सच भी है की मैंने नौकरिया छोड़ी है पर क्या उस समाज के लिए छोड़ी है जो मेरे पीछे मेरी चर्चा करता है बिलकुल भी नहीं मैंने इसलिए छोड़ी की मुझे पसंद नहीं आई। पर क्या समाज पसंद न आए तो समाज छोड़ सकता हूँ बिलकुल नहीं फिर मुझे अपने हिसाब से अपने लायक समाज की तलाश करनी होगी। क्या आपने कभी किसी बैंकर को किसी डकैत के साथ चर्चा करते सुना है नहीं न आपने कभी किसी रईश को किसी की गरीबी और लाचारी में उसका हाथ थामते देखा है अगर देखा भी होगा तो ऐसा विरल ही होगा। जो जिस व्यवसाय में होता है उसका समाज उसी के अनुरूप हो जाता है।
अब अनाथ होने का दर्द वो क्या समझेंगे जो अपने माँ बाप के साथ रहते है ठीक उसी प्रकार संतान न होने की पीड़ा वही समझ सकते है जिनके बच्चे नहीं है। एक छात्र के मस्तिष्क मंडल पर लगने वाले असंतुलित बल को एक छात्र ही समझ सकता है और एक शिक्षक की अभिलाषा एक शिक्षक।
इसलिए दोस्त समाज से डरो नहीं समाज का सम्म्मान करो पर तभी तक जब तक ये समाज आपके आत्मसम्मान को नुक्सान न पहुचाये।
धन्यवाद
आशीष
A.K

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